सारद जो सत कोटि मिले, कलपन करैं विचार।
वृन्दावन सुख रंग कौ, कबहुँ न पायौ पार॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (98)
यदि कोटि-कोटि सरस्वती कल्पों तक विचार करें, तब भी श्री वृन्दावन के सुख-सम्पत्ति अर्थात् वृन्दावन रस का पार नहीं पा सकते।
वृन्दावन सुख रंग कौ, कबहुँ न पायौ पार॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (98)
यदि कोटि-कोटि सरस्वती कल्पों तक विचार करें, तब भी श्री वृन्दावन के सुख-सम्पत्ति अर्थात् वृन्दावन रस का पार नहीं पा सकते।

