किशोरी मोरी अब न लगाओ बार,
रसिकन मुख सुनी दीन को, आदर यही दरबार ।
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, दैन्य माधुरी (33)
हे मेरी किशोरीजी अब आप मुझ पर कृपा कीजिये। मैंने रसिकों से सुना है कि आपका ही केवल एक दरबार है जहाँ दीन जन को आदर की दृष्टि से देखा जाता है।
रसिकन मुख सुनी दीन को, आदर यही दरबार ।
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, दैन्य माधुरी (33)
हे मेरी किशोरीजी अब आप मुझ पर कृपा कीजिये। मैंने रसिकों से सुना है कि आपका ही केवल एक दरबार है जहाँ दीन जन को आदर की दृष्टि से देखा जाता है।

