धर्माद्यर्थ चतुष्टयं विजयतं किं तदवृथा वार्त्तया,
सैकान्तेश्वर भक्तियोग पदवी त्वारोपिता मूर्द्धनि ।
यो वृन्दावन सीम्नि कञ्चन घनाश्चयःर्य किशोरीमणि-
स्तत्कैंकर्य रसामृतादिह परं चित्ते न मे रोचते ॥
- मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री राधा सुधा निधि (77)
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये उत्तम चार फल यदि विश्व में उत्कृष्टता को प्राप्त हैं तो भले ही रहें, हमें इनकी व्यर्थ चर्चा से क्या और ईश्वर की उस एकान्त भक्ति-योग-पदवी भी रहे हमें उससे भी क्या मतलब, अर्थात् भक्ति-योग का आदर तो करते हैं पर उससे भी क्या लेना-देना है हमारे चित्त को तो श्रीवृन्दावन की सीमा में विराजमान् एक घनीभूत आश्चर्यरूपा किशोरी-मणि (श्री राधा) के कैंकर्य रसामृत के अतिरिक्त और कुछ भी अच्छा नहीं लगता।
सैकान्तेश्वर भक्तियोग पदवी त्वारोपिता मूर्द्धनि ।
यो वृन्दावन सीम्नि कञ्चन घनाश्चयःर्य किशोरीमणि-
स्तत्कैंकर्य रसामृतादिह परं चित्ते न मे रोचते ॥
- मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री राधा सुधा निधि (77)
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये उत्तम चार फल यदि विश्व में उत्कृष्टता को प्राप्त हैं तो भले ही रहें, हमें इनकी व्यर्थ चर्चा से क्या और ईश्वर की उस एकान्त भक्ति-योग-पदवी भी रहे हमें उससे भी क्या मतलब, अर्थात् भक्ति-योग का आदर तो करते हैं पर उससे भी क्या लेना-देना है हमारे चित्त को तो श्रीवृन्दावन की सीमा में विराजमान् एक घनीभूत आश्चर्यरूपा किशोरी-मणि (श्री राधा) के कैंकर्य रसामृत के अतिरिक्त और कुछ भी अच्छा नहीं लगता।

