सुनो मन! यह अनन्य की रीत।
गौर श्याम प्रिय परिजन तजी कहुं, करत न सपनहु प्रीत।
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (119)
अरे मन अनन्यता की रीति सुन, केवल और केवल श्यामा श्याम और उनके रसिकों को छोड़कर सपने में भी कहीं प्रीती भूल कर भी मत करना।
गौर श्याम प्रिय परिजन तजी कहुं, करत न सपनहु प्रीत।
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (119)
अरे मन अनन्यता की रीति सुन, केवल और केवल श्यामा श्याम और उनके रसिकों को छोड़कर सपने में भी कहीं प्रीती भूल कर भी मत करना।

