दुख सुख भुगतै देह, नहिं कछु संक है।
निंदा अस्तुति करौ, राव क्या रंक है।।
परमारथ व्यवहार, बनौ कि ना बनौ ।
अंजन है मम नैन, रसिक भगवत सनौ।।
- श्री भगवत रसिक - भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (47)
भगवत रसिक जी कहते है कि मेरा शरीर सुख भोगता रहे अथवा दुःख, संसार मेरी निंदा करता रहे या स्तुति, मैं धन सम्पन्न हो जाऊँ अथवा कंगाल, परमार्थ या लोक व्यवहार मुझसे बने या न बने इन सब बातों की मुझे कोई परवाह नहीं। मेरी यही प्रार्थना है कि आप दोनों मेरी आँखों में अंजन बनकर लगे रहें, अर्थात वह रस दृष्टि मिली रहे, जिससे प्रिया प्रियतम के नित्य विहार का अवलोकन बना रहे ।।
निंदा अस्तुति करौ, राव क्या रंक है।।
परमारथ व्यवहार, बनौ कि ना बनौ ।
अंजन है मम नैन, रसिक भगवत सनौ।।
- श्री भगवत रसिक - भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (47)
भगवत रसिक जी कहते है कि मेरा शरीर सुख भोगता रहे अथवा दुःख, संसार मेरी निंदा करता रहे या स्तुति, मैं धन सम्पन्न हो जाऊँ अथवा कंगाल, परमार्थ या लोक व्यवहार मुझसे बने या न बने इन सब बातों की मुझे कोई परवाह नहीं। मेरी यही प्रार्थना है कि आप दोनों मेरी आँखों में अंजन बनकर लगे रहें, अर्थात वह रस दृष्टि मिली रहे, जिससे प्रिया प्रियतम के नित्य विहार का अवलोकन बना रहे ।।

