बिछुरन मिलन जहाँ रहै - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (231)

बिछुरन मिलन जहाँ रहै - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (231)

बिछुरन मिलन जहाँ रहै, सुद्ध प्रेम नहिं होइ।
मिलत मिलत बढ़ै चाह अति, सुद्ध प्रेम है सोंइ॥

- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (231)

जहाँ विरह (बिछुड़ना) और मिलन का चक्र बना रहता है, वहाँ प्रेम की पराकाष्ठा 'विशुद्ध प्रेम' नहीं होता। इसके विपरीत, प्रतिक्षण साथ रहते हुए भी मिलने की उत्कंठा और अधिक बढ़ती जाए—वही वास्तविक शुद्ध प्रेम है। इस अलौकिक 'नित्य-विहार' में प्रिया-प्रियतम सदा साथ हैं, फिर भी उनकी व्याकुलता बढ़ती ही जाती है।