रहि मन वृंदावन की शरण, यह रस पसु निरस तू छाँडत - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (93)

रहि मन वृंदावन की शरण, यह रस पसु निरस तू छाँडत - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (93)

रहि मन वृंदावन की शरण,
यह रस पसु निरस तू छाँडत, भाजत पेटहि भरन।
व्यास अनन्य भक्तिकी जीवनि, बन में मंगल मरन।

- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (93)

हे मन ! श्री वृन्दावन की शरण ग्रहण कर । जीवन भर इस दिव्य रस को छोड़ कर पशु की भाँति नीरस मन लेकर कहाँ पेट भरने के लिए भाग रहा है ? श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि श्री वृन्दावन ही अनन्य रसिक भक्त की जीवनी है और इस वन में मरना भी मंगल कारी है।