नित्य विहार करति वृन्दावन, कुंजनि प्रेम अगाधा।
किमी 'कृपालु' तहँ रहि सकत सपनेहुँ , भुक्ति मुक्ति दोई बाधा।
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (35)
वृन्दावनेश्वरी श्री राधा (मानो प्रेम की अगाध समुद्र), जो वृन्दावन धाम में नित्य विहार करती हैं एवं अपने जन को नित्य विहार रस देती हैं , उनका कृपा पात्र जीव, सपने में भी मुक्ति और भुक्ति में आसक्त नहीं हो सकता।
किमी 'कृपालु' तहँ रहि सकत सपनेहुँ , भुक्ति मुक्ति दोई बाधा।
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (35)
वृन्दावनेश्वरी श्री राधा (मानो प्रेम की अगाध समुद्र), जो वृन्दावन धाम में नित्य विहार करती हैं एवं अपने जन को नित्य विहार रस देती हैं , उनका कृपा पात्र जीव, सपने में भी मुक्ति और भुक्ति में आसक्त नहीं हो सकता।

