(राग रामकली)
॥दोहा॥
॥दोहा॥
चित्ताकर्षनि चंचला, वर्षनि-घन-रस-प्रेम।
जयति नित्यनागरि निपुन, रसिकमनी तन-हेम॥
॥पद॥
जयति नवनित्य नागरि निपुन राधिके रसिक-सिरमौरि मनमोहनी जू।
चारु छबि चंचला चित्त आकर्षनी वर्षनी प्रेम-घन मोहनी जू॥
सहज सिद्धा प्रसिद्धा प्रकासिक प्रभा दिव्य बर कनक-तन मोहनी जू।
स्वामिनी सुखद श्रीहरिप्रिया बिसद जस प्रान की परम धन मोहनी जू॥
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सुरत सुख (01)
(दोहा)
श्रीलालजू के चित्त को आकर्षित करने वाली उन विद्युत्-सदृश आभा वाली श्रीस्वामिनीजू की जय हो, जो रस के साक्षात् घन श्रीलालजू को द्रवीभूत कर प्रेम की वर्षा करती हैं। जो नित्य नागरि, परम चतुर तथा रसिकों के शिरोमणि स्वरूप हैं और जिनके अंगों की कान्ति तप्त स्वर्ण के समान है।
(पद)
श्रीस्वामिनी जी नित्य नव नागरी रसविदग्धा और पूर्ण चातुर्य युक्ता हैं। इसी लिये रसिक सिरमौर श्रीलाल जू के भी मन को मोहन करने में समर्थ हैं। आपके अङ्ग की छटा विधुत वर्णा है। इसलिये रस घन स्वरूप श्रीलाल जू के चित्त को खेंच कर आप प्रगाढ़ प्रेम की वर्षा करती हैं। आप स्वभाविक प्रसिद्ध श्रीप्रीतम की प्रभा को प्रकाश करने वाली है। दिव्य श्रेष्ठ स्वर्ण सरीखी आपकी कान्ति है। आपका विशद वश विख्यात है। श्रीहरि प्रिया सखी को आप सुख प्रदान करने वाली प्राण धन के समान है।

