वृन्दारण्ये नव रस-कला-कोमल प्रेम-मूर्ति - मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री राधा सुधा निधि (261)

वृन्दारण्ये नव रस-कला-कोमल प्रेम-मूर्ति - मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री राधा सुधा निधि (261)

वृन्दारण्ये नव रस-कला-कोमल प्रेम-मूर्ति:,
श्रीराधायाश्चरण-कमलामोद - माधुर्य्य - सीमा ।
राधा ध्यायन् रसिक-तिलकेनात्त केली-विलासां,
तामेवाहं कथमिह तनुं न्यस्य दासी भवेयम् ।।

- मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री राधा सुधा निधि (261)

कोमल-मूर्ति श्री राधा, जिनके चरणों में एक अद्भुत दिव्य रस बरसता है, जिनका पूर्ण, नित्य नवीन, किशोर स्वरुप एवं दिव्य प्रेम केवल श्री वृन्दावन धाम में नित्य ही प्रफुल्लित होता है, जिन्होंने रसिक-तिलक श्रीलालजी के साथ केलि-विलास करना स्वीकार किया है, क्या ऐसा कभी होगा कि उनका मैं ध्यान करती हुई, अपने शरीर को त्याग कर उनके चरण-कमल के आमोद-माधुर्य्य की अवधि-स्वरूप दासी होऊँगी?