कहत हौं बने न ब्रज की रीति - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (5)

कहत हौं बने न ब्रज की रीति - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (5)

कहत हौं बने न ब्रज की रीति।
सब गोपाल उपासक, तन मन वृन्दावन सौं प्रीती॥

- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (5)

ब्रज की इतनी अधिक महिमा है कि ब्रज की रीति कहते ही नहीं बनती। समस्त वास्तविक गोपाल उपासक वृन्दावन धाम में तन और मन से प्रीति रखते हैं अर्थात् शरणागत हैं।