कोउ सुकिया, कोउ परकिया, कलपि किये मत बादि।
जोरी भगवतरसिक की, नित्य अनंत अनादि॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (5)
किसी ने स्वकीया और परकीया (नायिका) के रूप में श्री प्रिया जी की कल्पना करके एक व्यर्थ का बखेड़ा सा खड़ा कर दिया है। भगवत रसिक जी कहते हैं कि हमारी प्रिया जी यानी यह रसिकों की जोड़ी एक क्षण को भी बिछुड़ नहीं सकती, यह नित्य, अनंत और अनादि है।
जोरी भगवतरसिक की, नित्य अनंत अनादि॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (5)
किसी ने स्वकीया और परकीया (नायिका) के रूप में श्री प्रिया जी की कल्पना करके एक व्यर्थ का बखेड़ा सा खड़ा कर दिया है। भगवत रसिक जी कहते हैं कि हमारी प्रिया जी यानी यह रसिकों की जोड़ी एक क्षण को भी बिछुड़ नहीं सकती, यह नित्य, अनंत और अनादि है।

