भक्ति भाव विस्वास न उपजे, घर घर रसिक कहाई।
बिन अनन्य संसार सिंधु में, फिर फिर गोता खाईं॥
- श्री नागरी देव, श्री नागरी देव जी की वाणी (10)
श्री राधारानी के चरणों में पूर्ण विश्वास और भक्ति मार्ग में दृढ़ता न होने पर भी घर-घर में लोग अपने आपको रसिक कहलाना चाहते हैं। जब तक श्री राधारानी में अनन्य प्रेम नहीं होगा, तब तक संसार में आवागमन लगा रहेगा और दुःख भोगना ही पड़ेगा; रसिक कहलाने से कुछ नहीं होगा।
बिन अनन्य संसार सिंधु में, फिर फिर गोता खाईं॥
- श्री नागरी देव, श्री नागरी देव जी की वाणी (10)
श्री राधारानी के चरणों में पूर्ण विश्वास और भक्ति मार्ग में दृढ़ता न होने पर भी घर-घर में लोग अपने आपको रसिक कहलाना चाहते हैं। जब तक श्री राधारानी में अनन्य प्रेम नहीं होगा, तब तक संसार में आवागमन लगा रहेगा और दुःख भोगना ही पड़ेगा; रसिक कहलाने से कुछ नहीं होगा।

