जै जै रसिक रवनी रवन। रूप गुन लवन्य प्रभुता प्रेम पूरन भवन - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वानी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (35)

जै जै रसिक रवनी रवन। रूप गुन लवन्य प्रभुता प्रेम पूरन भवन - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वानी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (35)

जै जै रसिक रवनी रवन। रूप गुन लवन्य प्रभुता प्रेम पूरन भवन।।
विपति जन की भानबे कौं तुम बिना कहु कवन।

- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वानी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (35)

हे रसिक शिरोमणि प्यारी जू , श्री किशोरीजी, आपकी जय हो जय हो! आप रूप, गुण, लावण्य प्रभुता और प्रेम की पूर्णता की धाम हो। आपके अतिरिक्त रसिक भक्त की विपत्ति को मिटाने वाला दूसरा कौन है?