रहौ कोऊ काहू मनहि दिये - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (20)

रहौ कोऊ काहू मनहि दिये - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (20)

रहौ कोऊ काहू मनहि दिये।
मेरे प्राणनाथ श्री श्यामा सपथ करौं तृण छिये ।।
जे अवतार कदंब भजत हैं धरि दृढ़ ब्रत जु हिये।
तेऊ उमगि तजत मर्जादा वन बिहार रस पिये।।
खोये रतन फिरत जे घर-घर कौन काज जिए ।
(जैश्री) हित हरिवंश अनत सचु नाहीं बिनु या रजहिं लिये।।

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (20)

प्रस्तुत पद में श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने श्री राधारानी के प्रति निष्ठा को शपथ खा कर व्यक्त किया है एवं श्री वृन्दावन धाम की उनकी एकमात्र निष्ठा को भी व्यक्त किया है।

कोई किसी में भी मन लगाए रहे मैं तो तृण स्पर्श करके शपथ पूर्वक कहता हूँ कि मेरे प्राणनाथ केवल एक श्रीश्यामा ही है।

जो लोग दृढ़ व्रत धारण करके अवतारों के समूह को भजते हैं वे भी वृन्दावन के प्रेम विहार रस का पान करते ही उमँग कर अपनी मर्यादा को त्याग देते हैं। 

जो रत्न को खोकर घर-घर भीख माँगते फिरते हैं उनके जीने से लाभ ही क्या है ? श्री हित हरिवंश महाप्रभु कहते हैं कि वृन्दावन की रज प्राप्ति किये बिना अन्यत्र हर जगह अशांति ही मिलेगी।