एक रज रेणुका पै चिंतामणि वारि डारौं - श्री अभयराम

एक रज रेणुका पै चिंतामणि वारि डारौं - श्री अभयराम

(कवित्त)
एक रज रेणुका पै चिंतामणि वारि डारौं।
वारि डारौं विश्व सेवाकुंज के विहार पै॥ [1]
लतान की पतान पै कोटि कल्प वारि डारौ।
रंभा हू कौ वारि डारौ गोपिन के द्वार पै॥ [2]
बृज की पनिहारिन पै रती सची वारि डारौ ।
वैकुण्ठ हू वारि डारों कालिंदी की धार पै॥ [3]
कहै अभे राम एक राधा जू को जानत हैं।
देवन कौ वारि डारो नन्द के कुमार पै॥ [4]

- श्री अभयराम

अनगिनत इच्छा-पूर्ति चिन्तामणियों को ब्रज की रज के एक कण पर न्यौछावर कर देना चाहिए । वृंदावन के सेवा कुंज के विहार पर पूर्ण विश्व को वार देना चाहिए । [1]

इच्छा पूर्ति करने वाले अनगिनत कल्प वृक्षों को ब्रज की लता पता पर वार देना चाहिए। अप्सराओं की रानी ‘रम्भा' को गोपियों के द्वार पर न्यौछावर कर देना चाहिए । [2]

कामदेव की पत्नी ‘रति' और इंद्र की पत्नी (स्वर्ग की रानी) ‘सचि' को ब्रज की पनिहारिन (जो ब्रज में पानी भरने की सेवा करती हैं ) पर न्यौछावर कर  देना चाहिए । भगवान् नारायण का वैकुण्ठ धाम यमुना रसरानी पर न्यौछावर कर देना चाहिए। [3]

श्री अभय राम कहते हैं, "मेरी आराध्या एकमात्र श्री राधा हैं, मैं उनके अतिरिक्त किसी और को सपने में भी नहीं  जानता, और नंद के पुत्र श्री कृष्ण पर समस्त भगवान् के अवतारों को ही न्यौछावर किया जा सकता है (जो स्वयं श्री राधारानी की शरण में हैं )"। [4]