व्यास विवेकी भगत सौं दृढ़ करि कीजै प्रीति।
अविवेकी कौ संग तजि, इहै भक्ति की रीति॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (67)
श्री हरिराम व्यास जी भक्ति की रीति को समझाते हुए कहते हैं कि यदि भक्ति में आगे बढ़ना है, तो रसिक-संत का दृढ़तापूर्वक संग करें और श्री राधा-कृष्ण में अपनी प्रीति बढ़ाएँ; तथा अविवेकी—जिन्हें भक्ति से कुछ लेना-देना नहीं है—और दुष्ट जनों के संग का पूर्ण रूप से त्याग करें।
अविवेकी कौ संग तजि, इहै भक्ति की रीति॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (67)
श्री हरिराम व्यास जी भक्ति की रीति को समझाते हुए कहते हैं कि यदि भक्ति में आगे बढ़ना है, तो रसिक-संत का दृढ़तापूर्वक संग करें और श्री राधा-कृष्ण में अपनी प्रीति बढ़ाएँ; तथा अविवेकी—जिन्हें भक्ति से कुछ लेना-देना नहीं है—और दुष्ट जनों के संग का पूर्ण रूप से त्याग करें।

