अलमस्त रहैं अलबेले लाल, लाडिली के रसमाते।
छकी छबि सों पलकें बर बरुनी नैननि में मुस्काते।।
- श्री नागरी देव जी, श्री नागरी देव जू की वाणी, श्रिंगार रस के पद (34)
रसिक शिरोमणि श्री लाल जू नित्य ही रसिकेश्वरी श्री लाड़ली जू (श्री राधारानी) के रस में विभोर होकर अलमस्त रहते हैं।श्री राधारानी की छवि के रस में श्री कृष्ण इतने छके रहते हैं कि उनकी अँखियाँ मुस्कुराती ही रहती हैं।
छकी छबि सों पलकें बर बरुनी नैननि में मुस्काते।।
- श्री नागरी देव जी, श्री नागरी देव जू की वाणी, श्रिंगार रस के पद (34)
रसिक शिरोमणि श्री लाल जू नित्य ही रसिकेश्वरी श्री लाड़ली जू (श्री राधारानी) के रस में विभोर होकर अलमस्त रहते हैं।श्री राधारानी की छवि के रस में श्री कृष्ण इतने छके रहते हैं कि उनकी अँखियाँ मुस्कुराती ही रहती हैं।

