जिनके देखै पुलक तन, रोमांचित ह्वै जाहि।
सुनत मधुर तिनके बचन, नैंन भरे जल आहि॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, मन शिक्षा (33)
जिन रसिक भक्तों के दर्शनमात्र से तन-मन-प्राण प्रफुल्लित हो जाएँ, और जिनकी मधुर वचनावली का श्रवण करते ही नेत्र अश्रुपूरित हो जाएँ—ऐसे रसिकों का ही संग करना चाहिए।
सुनत मधुर तिनके बचन, नैंन भरे जल आहि॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, मन शिक्षा (33)
जिन रसिक भक्तों के दर्शनमात्र से तन-मन-प्राण प्रफुल्लित हो जाएँ, और जिनकी मधुर वचनावली का श्रवण करते ही नेत्र अश्रुपूरित हो जाएँ—ऐसे रसिकों का ही संग करना चाहिए।

