चस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहि।
भई प्रीति परतीत उर, अंतर लीनौं जोहि।।
अंतर लीनौं जोहि, निरंतर निज धन पायौ।
सुक, नारद, रसरीति, प्रगट परिपूरन ससना ।
प्रेम पियूस न स्रवै, भाव रूपी बिनु चस्मा ।।
- श्री भगवत रसिक - भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (7.8)
भावार्थ - श्री लाडली जी ने स्वयं हमें यह नित्य बिहार की दृष्टि प्रदान की है। इससे हमारे मन में प्रेम के प्रति पक्का विश्वास उत्पन्न हो गया है और अब तो हमने उस प्रेम रस को अपने हृदय में विलास करते हुए देख भी लिया है। अब हमें हमारा ऐसा निज धन मिल गया है, जिसकों कभी कोई अंतर नहीं आता, अर्थात जो हर क्षण प्राप्त है । श्री शुकदेवजी, श्री नारद जी, श्री सनकादिक-कुमार तथा वेद शास्त्र- इन सब ने नित्य रस का गायन तो किया है, किंतु नेति नेति पूर्वक (रस के नित्य स्वरूप को उन्होंने प्रकट रूप में नहीं गाया है)। भगवतरसिक जी कहते हैं कि यह रसरीति ऐसी है, जिसमें प्रिया प्रियतम का परिपूर्ण सौंदर्य उजागर हो जाता है, परन्तु बिना श्री प्रिया जू की करुणा के (अर्थात भाव रुपी दृष्टि मिले), नित्य विहार का यह दुर्लभ प्रेम रस प्राप्त करना सर्वथा असंभव है ।।
भई प्रीति परतीत उर, अंतर लीनौं जोहि।।
अंतर लीनौं जोहि, निरंतर निज धन पायौ।
सुक, नारद, रसरीति, प्रगट परिपूरन ससना ।
प्रेम पियूस न स्रवै, भाव रूपी बिनु चस्मा ।।
- श्री भगवत रसिक - भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (7.8)
भावार्थ - श्री लाडली जी ने स्वयं हमें यह नित्य बिहार की दृष्टि प्रदान की है। इससे हमारे मन में प्रेम के प्रति पक्का विश्वास उत्पन्न हो गया है और अब तो हमने उस प्रेम रस को अपने हृदय में विलास करते हुए देख भी लिया है। अब हमें हमारा ऐसा निज धन मिल गया है, जिसकों कभी कोई अंतर नहीं आता, अर्थात जो हर क्षण प्राप्त है । श्री शुकदेवजी, श्री नारद जी, श्री सनकादिक-कुमार तथा वेद शास्त्र- इन सब ने नित्य रस का गायन तो किया है, किंतु नेति नेति पूर्वक (रस के नित्य स्वरूप को उन्होंने प्रकट रूप में नहीं गाया है)। भगवतरसिक जी कहते हैं कि यह रसरीति ऐसी है, जिसमें प्रिया प्रियतम का परिपूर्ण सौंदर्य उजागर हो जाता है, परन्तु बिना श्री प्रिया जू की करुणा के (अर्थात भाव रुपी दृष्टि मिले), नित्य विहार का यह दुर्लभ प्रेम रस प्राप्त करना सर्वथा असंभव है ।।

