किं रे धूर्त्त-प्रवर निकटं यासि न: प्राण-सख्या,
नुनंवाला कुच-तट-कर-स्पर्श मात्राद्विमुह्ययेत ।
इत्थं राधे पथि-पथि रसात्रागरं तेनुलग्नं,
क्षीपत्वा भङ्गया हृदयमुभयो: करहि सम्मोहयिष्ये ।।
- मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री राधा सुधा निधि (190)
''क्यों रे धृर्त्त श्रेष्ठ ! हमारी प्राण-प्यारी सखी के निकट क्यों चला आता है ? दूर ही रह। तू नहीं जानता कि सुकुमारी बाला की कुच-तटी का स्पर्श करने मात्र से ही तू विमुग्ध हो जायगा !’' हे श्रीराघे ! इस प्रकार वाणी- चातुर्य्य के द्वारा मैं कब तुम्हारे अनुगमन-शील रसिक-नागर को दूर हटाकर, तुम दोनों के ह्रदय को विमुग्ध करूँगी?
नुनंवाला कुच-तट-कर-स्पर्श मात्राद्विमुह्ययेत ।
इत्थं राधे पथि-पथि रसात्रागरं तेनुलग्नं,
क्षीपत्वा भङ्गया हृदयमुभयो: करहि सम्मोहयिष्ये ।।
- मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री राधा सुधा निधि (190)
''क्यों रे धृर्त्त श्रेष्ठ ! हमारी प्राण-प्यारी सखी के निकट क्यों चला आता है ? दूर ही रह। तू नहीं जानता कि सुकुमारी बाला की कुच-तटी का स्पर्श करने मात्र से ही तू विमुग्ध हो जायगा !’' हे श्रीराघे ! इस प्रकार वाणी- चातुर्य्य के द्वारा मैं कब तुम्हारे अनुगमन-शील रसिक-नागर को दूर हटाकर, तुम दोनों के ह्रदय को विमुग्ध करूँगी?

