आदि अंत अरु मध्य में - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (24)

आदि अंत अरु मध्य में - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (24)

आदि अंत अरु मध्य में, यह रसिकन की रीति।
संत सबै गुरुदेव हैं, व्यासहि यह परतीति॥

- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (24)

श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि आदि, अंत और मध्य—अर्थात सदा-सर्वदा—रसिकों की यही एक रीति और अनन्य निष्ठा रही है कि वे समस्त संतों को अपने गुरुदेव के ही समान पूज्य मानते हैं। उनमें छोटे-बड़े का कोई भेद नहीं होता; अर्थात रसिक जन सम्प्रदायवाद से कोसों दूर रहते हैं।