जाग्रत्स्वप्न सुषुप्तिषु स्फुरतु में राधापदाब्जच्छटा - श्री हित हरिवंश महाप्रभु,  (164)

जाग्रत्स्वप्न सुषुप्तिषु स्फुरतु में राधापदाब्जच्छटा - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, (164)

जाग्रत्स्वप्न सुषुप्तिषु स्फुरतु में राधापदाब्जच्छटा,
वैकुण्ठे नरकेथ या मम गतिर्नान्यास्तु राधां विना ।
राधा-केलि-कथा-सुधान्बुधि महावीचीभिरान्दोलितं,
कालिन्दी-तट-कुञ्ज-मन्दिर-वरालिन्दे मनो विन्दतु ।।

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, राधा सुधा निधि (164)

श्रीराधा-केलि-कथा-सुधा-समुद्र की महान् लहरियों से आन्दोलित मेरा मन कालिन्दी- कूलवर्त्ती श्रेष्ठ लता मन्दिर के प्राङ्गण में ही आनन्द पाता रहे और जागृत, स्वप्न-एवं सुषुप्ति में भी श्रीराधा-पद-कमलों की छटा ही मेरे मन में स्फुरित होती रहे, किं बहुना, बैकुण्ठ अथवा नरक में भी श्रीराधा के अतिरिक्त मेरे लिये कोई अन्य गति न हो ।