बिछुरन रहित सुबस्तु है - श्री ललित किशोरी देव जू की बानी, सिद्धान्त की साखी (173)

बिछुरन रहित सुबस्तु है - श्री ललित किशोरी देव जू की बानी, सिद्धान्त की साखी (173)

बिछुरन रहित सुबस्तु है, सुनहि रसिक चित्त लाई।
श्री स्वामी हरिदास जू, प्रगट सुनाई आई॥

- श्री ललित किशोरी, श्री ललित किशोरी देव जू की बानी, सिद्धान्त की साखी (173)

हे रस के अनुरागी रसिक जनों! चित्त लगाकर इस दुर्लभ नित्य-विहार-रस को सुनो। इस रस में श्री प्रिया–प्रियतम एक क्षण के लिए भी वियोग को प्राप्त नहीं होते। इसी दुर्लभ रस के गान के लिए ही स्वयं श्री ललिता सखी, स्वामी श्री हरिदास के रूप में प्रकट हुई हैं।