प्रीति की रीति रँगीलोइ जानै - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, हित चौरासी (41)

प्रीति की रीति रँगीलोइ जानै - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, हित चौरासी (41)

(राग सारंग)
प्रीति की रीति रँगीलोइ जानै।
जछपि सकल लोक चूड़ामनि दीन अपनपौ माने।।
जमुना पुलिन निकुंज भवन में मान मानिनी ठानै।
निकट नवीन कोटि कामिनि कुल धीरज मनहिं न आनै।।|
नस्वर नेह चपल मधुकर ज्यौं आँन आँन सौं बानै।
( जै श्री ) हित हरिवंश चतुर सोई लालहिं छाड़ि मैंड़ पहिचानै।।

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, हित चौरासी (41)

भावार्थ-प्रीति की रीति तो केवल रँगीले गीले (प्रेमी) श्रीलालजी ही जानते हैं, अन्य कोई नहीं; तभी तो वे समस्त लोकों के अधिनायक-सिर मौर होकर भी अपने आप को (प्रेम परवश) दीन (लघु) मानते है। जब यमुना पुलिन पर निकुञ्ज भवन में श्रीराधिका मान ठान कर मानिनि हो जाती है (या रूठ कर अन्यत्र चली जाती है तब ये अपने निकट कोटि कोटि कामिनियों के होते रहने पर भी अपने मन में धैर्य नहीं लाते , (व्याकुल हो हो जाते हैं अपनी प्रियतमा के बिना।) श्री हित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं( किंतु उपरोक्त एक निष्ठा के विपरीत) जो प्रेम चपल भ्रमर के भाँति (क्षण क्षण में) अन्य अन्य किन्हीं से बनता (और विगड़ता भी) रहता है वह तो विनाशी है, नश्वर है। (किमधिकं प्रेम ही नहीं है।) (अब) जो (उपासक प्रेमा) श्रीलालजी को भी छोड़ (अलग रख) कर इस (प्रेम मर्यादा) मैंड़ को पहचानता है वही चतुर है-सच्चा विवेकी है।