देवानामथ भक्त मुक्त सुहृदामत्यन्त दूरं च यत्, प्रेमानन्द रसं महा सुखकरं चोच्चारितं प्रेमत: ।
प्रेम्णाकर्णयते जपत्यथ मुदा गायत्यथालिष्वयं, जल्पत्यश्रुमुखो हरिस्तदमृतं राधेति मे जीवनम् ॥
- मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री राधा सुधा निधि (96)
जो देवताओं, भक्तों, मुक्तों और स्वयं श्रीलालजी के सुहृद-वर्गों से भी अत्यन्त दूर है, जो प्रेमानन्द-रस स्वरूप है, जो प्रेम-पूर्वक उच्चरित हो पर महा सुखकर है। श्रीलालजी स्वयं जिसको श्रवण करते एवं जप कर हैं अथवा सखी-गणों के मध्य में प्रीतिपूर्वक गान भी करते हैं और कभी प्रेमाधु-पूर्ण मुख से जिसका बारम्बार उच्चारण करते हैं, वही श्री राधा नामामृत मेरा जीवन है।
प्रेम्णाकर्णयते जपत्यथ मुदा गायत्यथालिष्वयं, जल्पत्यश्रुमुखो हरिस्तदमृतं राधेति मे जीवनम् ॥
- मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री राधा सुधा निधि (96)
जो देवताओं, भक्तों, मुक्तों और स्वयं श्रीलालजी के सुहृद-वर्गों से भी अत्यन्त दूर है, जो प्रेमानन्द-रस स्वरूप है, जो प्रेम-पूर्वक उच्चरित हो पर महा सुखकर है। श्रीलालजी स्वयं जिसको श्रवण करते एवं जप कर हैं अथवा सखी-गणों के मध्य में प्रीतिपूर्वक गान भी करते हैं और कभी प्रेमाधु-पूर्ण मुख से जिसका बारम्बार उच्चारण करते हैं, वही श्री राधा नामामृत मेरा जीवन है।

