(कवित्त)
जहाँ-जहाँ राधा प्यारी धरति चरन पिय,
तहाँ-तहाँ नैननि के पाँवड़े बनावहीं। [1]
महा प्रेम रंग हीं तिनहीं के प्यार पगे,
सेवा सब अंगनि की करैं सचु पावहीं॥ [2]
मादिक मधुर पियैं प्यारी कौ सुभाव लियैं ,
छिन-छिन भाँति-भाँति लाड़नि लड़ावहीं। [3]
तैसियै प्रवीन प्यारी 'हित धुव' सुकुमारी,
समुझि सनेह रस कंठ सौं लगावहीं॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 2 (28)
श्री वृन्दावन की रसमयी भूमि में जहाँ-जहाँ प्रिया श्री राधा अपने सुकोमल चरणों को स्थापित करती हैं, वहीं-वहीं अनुरागी रसिक प्रियतम नेत्रों के पाँवड़े बिछाते चलते हैं। [1]
महा प्रेम के रंग में रंगे हुए प्रियतम, प्रिया की प्रगाढ़ आसक्ति में ऐसे डूबे हुए हैं कि उन्हें प्रिया के प्रत्येक अंग की सेवा में संलग्न रहकर ही परम सुख की अनुभूति होती है। [2]
प्रेम के मधुरासव में छकते हुए, अपनी प्राण-प्रिया की रुचि को सँभालते हुए वे प्रतिक्षण विभिन्न प्रकार के लाड़-प्यार में ही खोये रहते हैं। [3]
श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि जैसे श्री लाल की अतिशय प्रेमासक्ति है, उसी प्रकार प्रेम-विचक्षणा प्रिया भी उनके प्रति अगाध प्रेम रंग से भरी हुई हैं, और प्रियतम के प्रेम की प्रगाढ़ता समझकर वे बार-बार उन्हें अपने कण्ठ से लगाती रहती हैं। [4]
जहाँ-जहाँ राधा प्यारी धरति चरन पिय,
तहाँ-तहाँ नैननि के पाँवड़े बनावहीं। [1]
महा प्रेम रंग हीं तिनहीं के प्यार पगे,
सेवा सब अंगनि की करैं सचु पावहीं॥ [2]
मादिक मधुर पियैं प्यारी कौ सुभाव लियैं ,
छिन-छिन भाँति-भाँति लाड़नि लड़ावहीं। [3]
तैसियै प्रवीन प्यारी 'हित धुव' सुकुमारी,
समुझि सनेह रस कंठ सौं लगावहीं॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 2 (28)
श्री वृन्दावन की रसमयी भूमि में जहाँ-जहाँ प्रिया श्री राधा अपने सुकोमल चरणों को स्थापित करती हैं, वहीं-वहीं अनुरागी रसिक प्रियतम नेत्रों के पाँवड़े बिछाते चलते हैं। [1]
महा प्रेम के रंग में रंगे हुए प्रियतम, प्रिया की प्रगाढ़ आसक्ति में ऐसे डूबे हुए हैं कि उन्हें प्रिया के प्रत्येक अंग की सेवा में संलग्न रहकर ही परम सुख की अनुभूति होती है। [2]
प्रेम के मधुरासव में छकते हुए, अपनी प्राण-प्रिया की रुचि को सँभालते हुए वे प्रतिक्षण विभिन्न प्रकार के लाड़-प्यार में ही खोये रहते हैं। [3]
श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि जैसे श्री लाल की अतिशय प्रेमासक्ति है, उसी प्रकार प्रेम-विचक्षणा प्रिया भी उनके प्रति अगाध प्रेम रंग से भरी हुई हैं, और प्रियतम के प्रेम की प्रगाढ़ता समझकर वे बार-बार उन्हें अपने कण्ठ से लगाती रहती हैं। [4]

