पिय प्यारी के संग रहै, बर अंगन माहीं।
ज्यौं दिनकर की किरन, छोडि दिनकर नहिं जाहीं॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 3 (7)
श्री भगवत् रसिक अपनी रसोपासना में सखियों को प्रिया–प्रियतम के अंगों में निवास करने वाली बताते हैं—जैसे दिनकर और उसकी किरणें, जो एक-दूसरे से हर क्षण अभिन्न रूप से संयुक्त रहती हैं।
ज्यौं दिनकर की किरन, छोडि दिनकर नहिं जाहीं॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 3 (7)
श्री भगवत् रसिक अपनी रसोपासना में सखियों को प्रिया–प्रियतम के अंगों में निवास करने वाली बताते हैं—जैसे दिनकर और उसकी किरणें, जो एक-दूसरे से हर क्षण अभिन्न रूप से संयुक्त रहती हैं।

