(राग ईमन व कल्याण)
जै जै रसिक रवनी रवन।
रूप गुन लवन्य प्रभुता प्रेम पूरन भवन ॥
विपति जन की भानबे कौं तुम बिन कहु कवन।
हरहु मन की मलिनता, व्यापै न माया पवन॥
विषय रस इन्द्रिय - अजीरन अति, करावहु बवन व ।
खोलिये हिय के नयन दरसै सुखद बन अवन॥
चतुर चिंतामनि, दयानिधि, दुसह दारिद दवन।
मेटिये भगवत ब्यथा, हँसि, भेंटिये तजि मवन ॥
- श्री भगवत रसिक - भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (35)
भावार्थ: हे रसिक शिरोमणि श्रीकिशोरी - किशोरजी, आपकी जय हो, जय हो ! आप रूप, गुण, लावण्य प्रभुता और प्रेम की पूर्णता की धाम हैं ।
जै जै रसिक रवनी रवन।
रूप गुन लवन्य प्रभुता प्रेम पूरन भवन ॥
विपति जन की भानबे कौं तुम बिन कहु कवन।
हरहु मन की मलिनता, व्यापै न माया पवन॥
विषय रस इन्द्रिय - अजीरन अति, करावहु बवन व ।
खोलिये हिय के नयन दरसै सुखद बन अवन॥
चतुर चिंतामनि, दयानिधि, दुसह दारिद दवन।
मेटिये भगवत ब्यथा, हँसि, भेंटिये तजि मवन ॥
- श्री भगवत रसिक - भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (35)
भावार्थ: हे रसिक शिरोमणि श्रीकिशोरी - किशोरजी, आपकी जय हो, जय हो ! आप रूप, गुण, लावण्य प्रभुता और प्रेम की पूर्णता की धाम हैं ।
आपके अतिरिक्त रसिक भक्त की विपत्ति को मिटाने वाला दूसरा कौन है? आप मेरे मन के (काम, कोध आदि) विकारों को नष्ट करके इसे ऐसा बना दीजिये कि माया की हवा इसे व्याप न सके - माया मन का स्पर्श न कर सके।
विषय रस के सेवन से मेरी इन्द्रियों को अत्यंत अजीर्ण हो गया है, आप इस (विषय रस) का वमन करा दीजिये, विषयों से मुक्ति दिला दीजिये।
आप मेरे हृदय के नेत्रों को खोल दीजिये, जिससे कि सर्वोपरि सुख प्रदान करने वाले श्रीधाम वृन्दावन के दर्शन मुझे होने लगें।
आप चतुर चिंतामणि हैं, दया की सागर हैं, असह्य दारिद्रय को नष्ट करने वाली हैं। श्री भगवत रसिकजी कहते हैं कि आप अपनी चुप्पी को छोडकर एक बार हँस दीजिये और इस प्रकार मेरी समस्त व्यथा को नष्ट करके मुझे भी अपना अंग संगी बना लीजिये।

