छिन छिन नई छबि पानिप रही है फबि - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 2 (30)

छिन छिन नई छबि पानिप रही है फबि - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 2 (30)

(कवित्त)
छिन छिन नई छबि पानिप रही है फबि,
राधिका-वल्लभ पर प्रान वारि डारियै। [1]
अंगनि झलक अरु भूषन झमक आली,
देखत रँगीली भाँति पलकें न टारियै॥ [2]
रँग भींनी करैं बात बीच-बीच मुसिकात,
चाहनि चपल चितै मोहीं सखी सारियै। [3]
प्रेम की अनूप गति भूली तहाँ ध्रुव-मति,
तन मन धन बुद्धि सबै बात हारियै॥ [4]

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 2 (30)

जिनके रूप में प्रतिक्षण छवि और लावण्य का नव-नव विकास होता रहता है, ऐसे श्री राधिकावल्लभ पर बरबस प्राण न्यौछावर हो जाते हैं। [1]

सखि! उनके श्री अंगों की कान्ति, आभूषणों की झनकार, और उनकी रसभरी सलौनी छवि को तो अपलक नेत्रों से देखते ही बनता है। [2]

जब वे सरस वार्ता में संलग्न होते हैं और बीच-बीच में मुस्कराते हैं, तब उनकी चपल अपाङ्गच्छवि को देखकर सब सखियाँ विमुग्ध हो जाती हैं। [3]

श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि उनके प्रेम की इस विलक्षण गति को देखकर बुद्धि चकित और थकी रहती है, तथा तन-मन-धन-प्राण सभी उन पर उत्सर्ग हो जाते हैं। [4]