स्याम हौं तुम्हरे गरैं परयौ,
जो बीती तुम्ही सौं बीती मन मानैं सु करौ।
रसिक दास की आस करुणानिधि, तुम्हीं ढरो सो ढरो।।
- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (02)
हे श्री बांके बिहारी जी महाराज मैं आपके गरे ही पढ़ गया हूँ, मैं तो केवल आपकी ही शरण में आया हूँ, ओर मेरे जीवन के पल आपसे ही बीते हैं, अब आपके मन में जैसा आये वैसा करो। श्री रसिक देव जी कहते हैं की हे बिहारीजी आप अगाध करुणा के सागर हैं, मेरी यही आशा है की आप कुछ ढरोगे सो ढरोगे, मैं कोई योग्य नहीं हूँ ।
जो बीती तुम्ही सौं बीती मन मानैं सु करौ।
रसिक दास की आस करुणानिधि, तुम्हीं ढरो सो ढरो।।
- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (02)
हे श्री बांके बिहारी जी महाराज मैं आपके गरे ही पढ़ गया हूँ, मैं तो केवल आपकी ही शरण में आया हूँ, ओर मेरे जीवन के पल आपसे ही बीते हैं, अब आपके मन में जैसा आये वैसा करो। श्री रसिक देव जी कहते हैं की हे बिहारीजी आप अगाध करुणा के सागर हैं, मेरी यही आशा है की आप कुछ ढरोगे सो ढरोगे, मैं कोई योग्य नहीं हूँ ।

