अलं कस्यापि संगत्या तवालं शास्त्रकर्मभिः।
वृन्दारण्यतृणम्मन्यो धन्यो न किंचिदाचरेत्।।
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (7.18)
तुम्हें किसी का संग करने की आवश्यकता नहीं एवं शास्त्रोक्त कर्मों का भी कोई प्रयोजन नहीं, क्योंकि जिन्होंने अपने को श्रीवृन्दावन के तृण समान समझ कर कृतार्थ जान लिया है उनके लिए कुछ भी करना शेष नहीं है।।
वृन्दारण्यतृणम्मन्यो धन्यो न किंचिदाचरेत्।।
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (7.18)
तुम्हें किसी का संग करने की आवश्यकता नहीं एवं शास्त्रोक्त कर्मों का भी कोई प्रयोजन नहीं, क्योंकि जिन्होंने अपने को श्रीवृन्दावन के तृण समान समझ कर कृतार्थ जान लिया है उनके लिए कुछ भी करना शेष नहीं है।।

