चरन कमल रज सेइयौं, मन वच क्रम यह आस।
अपनों सरवस जानिकेँ, बलि जाय नागरीदास॥
- श्री नागरी देव जी, श्री नागरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (01)
अपनी वाणी के शुभारंभ से पूर्व मेरी एकमात्र अभिलाषा है कि मैं श्री नित्य विहारिणी (श्री राधा), श्री नित्य विहारी (श्री कृष्ण), श्री स्वामी हरिदास जी अथवा समस्त रसिकों के चरण-कमलों की जो यह सम्मिलित रज, श्री धाम वृंदावन की रज के रूप में विद्यमान है, उसको ही मैं अपना सर्वस्व मानकर, उसी रज का मन, कर्म और वचन से सदाकाल दृढ़ भाव से निरंतर सेवन करूँ और उसी पर बलिहारी जाऊँ।
अपनों सरवस जानिकेँ, बलि जाय नागरीदास॥
- श्री नागरी देव जी, श्री नागरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (01)
अपनी वाणी के शुभारंभ से पूर्व मेरी एकमात्र अभिलाषा है कि मैं श्री नित्य विहारिणी (श्री राधा), श्री नित्य विहारी (श्री कृष्ण), श्री स्वामी हरिदास जी अथवा समस्त रसिकों के चरण-कमलों की जो यह सम्मिलित रज, श्री धाम वृंदावन की रज के रूप में विद्यमान है, उसको ही मैं अपना सर्वस्व मानकर, उसी रज का मन, कर्म और वचन से सदाकाल दृढ़ भाव से निरंतर सेवन करूँ और उसी पर बलिहारी जाऊँ।

