यह आसा धरि चित्त में, कहत जथा मति मोर।
वृन्दावन सुख रंग कौ, काहू न पायौ ओर॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (04)
श्री राधारानी की कृपा की आशा चित्त में धारण कर, यथामति श्री वृन्दावन की महिमा का वर्णन करता हूँ; क्योंकि श्री वृन्दावन की माधुरी अनन्त है, जिसका आज तक किसी ने भी आदि और अंत नहीं पाया है।
वृन्दावन सुख रंग कौ, काहू न पायौ ओर॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (04)
श्री राधारानी की कृपा की आशा चित्त में धारण कर, यथामति श्री वृन्दावन की महिमा का वर्णन करता हूँ; क्योंकि श्री वृन्दावन की माधुरी अनन्त है, जिसका आज तक किसी ने भी आदि और अंत नहीं पाया है।

