अत्युत्कृष्टे सकलविधया श्रीलवृन्दावनेऽस्मिन् - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.11)

अत्युत्कृष्टे सकलविधया श्रीलवृन्दावनेऽस्मिन् - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.11)

अत्युत्कृष्टे सकलविधया श्रीलवृन्दावनेऽस्मिन्, दोषान् दृष्टान्निजगतदृशा वास्तवान् ये वदन्ति।।
तादृक् मूढ़ा हरि हरि! मम प्राणबाधेऽप्यदृश्याः, संभाव्या वा कथमपि नहि प्राय सर्वस्य हास्याः।।1. 11।।

- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.11)

सर्वभाव से अति उत्कृष्ट इस श्रीवृन्दावन में निज दुर्भाग्यवश दृष्ट-दोषों को जो लोग सत्य मान कर वर्णन करते हैं, अहो ! उन मूर्ख लोगों के मुख मैं प्राण संकट आने पर भी दर्शन नहीं करूंगा। किसी भी विषय में क्यों न हो क्या वे सब के सामने उपहास्यास्पद न होकर रह सकते हैं ?