श्री यमुना देवी द्वारा नित्य विहार रस की व्याख्या - पद्म पुराण
वृन्दावन में वियोग नहीं है: जब द्वारिका धीश की पटरानियां श्री यमुना जी से मिलीं?
द्वारिकाधीश की पटरानियों ने यमुना जी को अत्यंत प्रमुदित अवस्था में देखा, तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ कि हमें तो वियोग कलेशित किये जा रहा है और यमुना जी भी तो श्री कृष्ण की पटरानियों में हैं और यह तो मंद मंद मुस्कुरा रही हैं, और इन्हे श्याम सुन्दर की वियोग पीड़ा का अनुभव नहीं हो रहा है, क्या बात है?
यमुना जी से पूछा, तो यमुना जी बोलीं - "वृन्दावन में वियोग है ही नहीं" ।
फिर पटरानियां बोलीं, लेकिन हम भी तो वृन्दावन में ही रह रही हैं ।
तो यमुना जी बोलीं: वृन्दावन में रहने से क्या हुआ? लेकिन अभी तुम्हारे हृदय में वृन्दावन का प्रकाश नहीं हुआ है। वृन्दावन के महात्म का बोध नहीं हुआ है और न ही उसकी पूर्ण अनुभूति हुई है । वृन्दावन में वियोग नहीं है । मुझे वियोग का अनुभव नहीं होता ।
"आत्मारामस्य कृष्णस्य ध्रुवमात्मास्ति राधिका ।
तस्या दास्यप्रभावेण विरहोऽस्मान् न संस्पृशेत् ॥ ११ ॥
- स्कन्दपुराण - खण्डः 2 (वैष्णवखण्डः)/भागवतमाहात्म्यम्/अध्यायः 02, छंद 11
यमुना जी कहती हैं: आत्मा में रमण करने वाली श्री कृष्ण की आत्मा श्री राधारानी हैं और उनकी मैं दासी बन चुकी हूँ । श्री राधारानी के दासता की महिमा है की हमें श्री कृष्ण के विरह का अनुभव नहीं हो रहा है क्यूंकि श्रीराधा के साथ यहाँ श्री कृष्ण नित्य विहार करते हैं ।
वृन्दावन में वियोग नहीं है: जब द्वारिका धीश की पटरानियां श्री यमुना जी से मिलीं?
द्वारिकाधीश की पटरानियों ने यमुना जी को अत्यंत प्रमुदित अवस्था में देखा, तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ कि हमें तो वियोग कलेशित किये जा रहा है और यमुना जी भी तो श्री कृष्ण की पटरानियों में हैं और यह तो मंद मंद मुस्कुरा रही हैं, और इन्हे श्याम सुन्दर की वियोग पीड़ा का अनुभव नहीं हो रहा है, क्या बात है?
यमुना जी से पूछा, तो यमुना जी बोलीं - "वृन्दावन में वियोग है ही नहीं" ।
फिर पटरानियां बोलीं, लेकिन हम भी तो वृन्दावन में ही रह रही हैं ।
तो यमुना जी बोलीं: वृन्दावन में रहने से क्या हुआ? लेकिन अभी तुम्हारे हृदय में वृन्दावन का प्रकाश नहीं हुआ है। वृन्दावन के महात्म का बोध नहीं हुआ है और न ही उसकी पूर्ण अनुभूति हुई है । वृन्दावन में वियोग नहीं है । मुझे वियोग का अनुभव नहीं होता ।
"आत्मारामस्य कृष्णस्य ध्रुवमात्मास्ति राधिका ।
तस्या दास्यप्रभावेण विरहोऽस्मान् न संस्पृशेत् ॥ ११ ॥
- स्कन्दपुराण - खण्डः 2 (वैष्णवखण्डः)/भागवतमाहात्म्यम्/अध्यायः 02, छंद 11
यमुना जी कहती हैं: आत्मा में रमण करने वाली श्री कृष्ण की आत्मा श्री राधारानी हैं और उनकी मैं दासी बन चुकी हूँ । श्री राधारानी के दासता की महिमा है की हमें श्री कृष्ण के विरह का अनुभव नहीं हो रहा है क्यूंकि श्रीराधा के साथ यहाँ श्री कृष्ण नित्य विहार करते हैं ।

