सम्प्रदाय नवधा भक्ति, वेद सुरसरी नीर - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (6.9)

सम्प्रदाय नवधा भक्ति, वेद सुरसरी नीर - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (6.9)

सम्प्रदाय नवधा भक्ति, वेद सुरसरी नीर।
ललिता सखी उपासना, ज्यौं सिंहनी कौ छीर॥
ज्यौं सिंहनी कौ छीर रहै कुंदन के बासन।
कै बच्चा के पेट, और घट कौ विनासन।॥
भगवत नित्य विहार पर, सबही के परदा ।
रहैं निरंतर पास रसिक बर सखी सम्प्रदा ॥

- श्री भगवत रसिक - भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (6.9)

नवधा भक्ति और वेदों से संबंधित सभी संप्रदाय ऐसे हैं जैसे गंगा का जल (युगों युगों से अनेक भक्त जन इस भक्ति रस रूपी गंगा जल से अपना अपना "घट'' भरते आ रहे हैं), किंतु ललिता सखी की वृन्दावन रस की उपासना का रस (गंगा जल नहीं, अपितु) सिंहनी का दूध है। (प्रत्येक घट इसे धारण नहीं कर सकता।) यह या तो कुंदन (शुध स्वर्ण) के प्रात्र में ठहरता है या सिंह के शिशु के पेट में । समस्त महापुरुषों, वेदों, अवतारों, प्रेमी युगल (रतिकाम, सीताराम, लक्षी-नारायण, पार्वती शंकर) इत्यादि में यह क्षमता नहीं कि नित्य विहार रुपी रस को प्रकाशित कर सकें, अर्थात सब का इस दुर्लभ रस से परदा है । अनन्य रसिकों में शिरोमणि स्वामी हरिदास जी, अनन्य रसिकता के आदर्श हैं इसलिए वे नित्यविहार रस से लबालब भरे हैं और हर क्षण नित्य विहार रस में ही मग्न हैं । उनके अंदर नित्य विहार रस के अतिरिक्त कुछ और है ही नहीं, न स्वर्ग की तृष्णा न नरक का भय, न भुक्ति मुक्ति की आकांक्षा, न विधि निषेध का झंझट न मंगल अमंगल का पचरा। इसी लिए उन्होंने सखी उपासना वृन्दावन रस नित्य विहार के रंग को प्रकाशित किया है।