करं ते पत्रार्लि किमपि कुचयो: कर्त्तुमुचितं,
पदं ते कुञ्जेषु प्रियमभिसरन्त्या अभिसृतौ।
दृषाै कुञ्जच्छी द्रैस्तव निभृत-केलिं कलयितुं,
यदा वीक्षे राधे तदपि भविता किं शुभ-दिनम् ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (105)
हे श्रीराधे ! मेरा ऐसा शुभ-दिन कब होगा, जब मैं आपके कुच-तटों पर अनिर्वचनीय पत्र-रचना करने के योग्य अपने हाथों को, कुञ्जों में प्रियतम के प्रति अभिसरण करती हुई आपका अनुगमन करने योग्य अपने पदों को, एवं कुञ्ज-छिद्रों से आपकी रहस्य-केलि दर्शन-योग्य अपने दोनों नयनों से देखूँगी ?
पदं ते कुञ्जेषु प्रियमभिसरन्त्या अभिसृतौ।
दृषाै कुञ्जच्छी द्रैस्तव निभृत-केलिं कलयितुं,
यदा वीक्षे राधे तदपि भविता किं शुभ-दिनम् ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (105)
हे श्रीराधे ! मेरा ऐसा शुभ-दिन कब होगा, जब मैं आपके कुच-तटों पर अनिर्वचनीय पत्र-रचना करने के योग्य अपने हाथों को, कुञ्जों में प्रियतम के प्रति अभिसरण करती हुई आपका अनुगमन करने योग्य अपने पदों को, एवं कुञ्ज-छिद्रों से आपकी रहस्य-केलि दर्शन-योग्य अपने दोनों नयनों से देखूँगी ?

