भ्रातस्ते किमु निश्चयेन विदितः स्वस्यान्तकालः किमु, त्वं जानासि महामनुं बलवतो मृत्योर्गतिस्तम्भने।
मृत्युस्तत् करणं प्रतीक्षत इति त्वं वेत्सि किंवा यतो, बारं बारमशंक एव चलसे वृन्दावनादन्यतः।।
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.50)
अरे भाई ! तू क्या अपने मृत्यु काल को निश्चय रूप से जानता है- कि कब होगा ? बलवान मृत्यु की गति को रोकने का क्या तू कोई महामन्त्र जानता है? मृत्यु तुम्हारे कार्य की अपेक्षा (इन्तजार) करेगी - क्या तेरी ऐसी धारणा है? जो तू बारम्बार निशंक-चित्त होकर वृन्दावन से अन्यत्र चला जाता है।
मृत्युस्तत् करणं प्रतीक्षत इति त्वं वेत्सि किंवा यतो, बारं बारमशंक एव चलसे वृन्दावनादन्यतः।।
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.50)
अरे भाई ! तू क्या अपने मृत्यु काल को निश्चय रूप से जानता है- कि कब होगा ? बलवान मृत्यु की गति को रोकने का क्या तू कोई महामन्त्र जानता है? मृत्यु तुम्हारे कार्य की अपेक्षा (इन्तजार) करेगी - क्या तेरी ऐसी धारणा है? जो तू बारम्बार निशंक-चित्त होकर वृन्दावन से अन्यत्र चला जाता है।

