धनपुत्रकत्रादिममता मम तापदा - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (5.46)

धनपुत्रकत्रादिममता मम तापदा - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (5.46)

धनपुत्रकत्रादिममता मम तापदा। इति व्यक्त्वाखिलं वृन्दावनमेव च मे वरम्।।
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (5.46)
धन, पुत्र कलत्रादि के प्रति जो मेरी ममता है, वही मुझे तापित करने वाली है। अतएव वह समस्त त्यागकर यह श्रीवृन्दावन ही मेरे लिए सर्वश्रेष्ठ है।