स्मेरां भङ्गी-त्रय-परिचितां साचि-विस्तीर्ण-दृष्टिं, वंशी-न्यस्ताधर-किशलयाम् उज्ज्वलां चन्द्रकेण ।
गोविन्दाख्यां हरि-तनुम् इतः केशि-तीर्थोपकण्ठे, मा प्रेक्षिष्ठास् तव यदि सखे बन्धु-सन्गे’स्ति रङ्गः ॥
- श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.239)
हे मेरे मित्र, यदि आप अपने मित्रों और रिश्तेदारों के साथ ही सुख और चैन से रहना चाहते हैं, तो श्री कृष्ण के उस रूप को कदापि न देखें जो वृंदावन में यमुना नदी के तट पर केशी घाट में विहार कर रहे हैं, जिनके होंठों पर हल्की मुस्कान है, जो त्रिभंगी हैं एवं जिनकी आँखें इधर उधर उन्मत्ता पूर्वक घूम रही हैं, जिनके होंठों पर बांसुरी है और जिन्होंने सिर पर मोर पँख धारण कर रखा है।
गोविन्दाख्यां हरि-तनुम् इतः केशि-तीर्थोपकण्ठे, मा प्रेक्षिष्ठास् तव यदि सखे बन्धु-सन्गे’स्ति रङ्गः ॥
- श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.239)
हे मेरे मित्र, यदि आप अपने मित्रों और रिश्तेदारों के साथ ही सुख और चैन से रहना चाहते हैं, तो श्री कृष्ण के उस रूप को कदापि न देखें जो वृंदावन में यमुना नदी के तट पर केशी घाट में विहार कर रहे हैं, जिनके होंठों पर हल्की मुस्कान है, जो त्रिभंगी हैं एवं जिनकी आँखें इधर उधर उन्मत्ता पूर्वक घूम रही हैं, जिनके होंठों पर बांसुरी है और जिन्होंने सिर पर मोर पँख धारण कर रखा है।

