वृन्दावन की चाह करो - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (२४२)

वृन्दावन की चाह करो - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (२४२)

वृन्दावन की चाह करो |
चाह कुचाह सकल वाहिर करि, अंतस दंपति नेह भरो ||

- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (२४२)

अरे मन तू समस्त अच्छी बुरी चाह को मिटा कर एक मात्र केवल और केवल वृन्दावन धाम की चाह कर और हृदय से एकमात्र युगल किशोर से ही नेह (प्रेम) बढ़ा।