हम सिष स्यामा स्याम के, गुरु हम स्यामा स्याम ।
ओत प्रोत अरपन कियौ, निज मन तन धन धाम।।
निज मन तन, धन धाम, निरंतर अंतर नाहीं।
निसदिन दुख सुख संग, असुचि सुचि घर बन माहीं।।
नश्वर नेह निमित्त, देह नाते सौं उपसम ।
भगवत हमरे प्रान, सदा भगवत के हैं हम ।।
- श्री भगवत रसिक - भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (41)
भावार्थ:
श्री भगवत रसिक जी भावमयी सखी भाव से कहते हैं कि हम श्यामा श्याम के शिष्य भी हैं और गुरु भी हैं (वे जैसी आज्ञा देते है, हम वैसा करते हैं और हम जैसा निर्देश देते है, वैसे वे रस विलसते हैं ) । प्रेम से ओत प्रोत होकर हमने उनको अपना सर्वस्व (मन, तन, धन, धाम) अर्पण कर दिया ।
अब हम में और श्यामा कुंजबिहारी में कोई भेद नहीं रह गया है - सर्वथा अभेद है। (वे भी प्रेम स्वरूप है और हम भी ) सुख में दुख में, शौच में अशौच में (सब स्थितियों में) घर में, वन में (सर्वत्र) और रात दिन (सर्वदा), एक दूसरे के साथ रहते हैं।
नश्वर प्रेम (आसक्ति) के कारण उत्पन्न होने वाले देह संबंधों का हमने पूर्ण रूप से परित्याग कर दिया है। अब तो प्रिया प्रियतम हमारे प्राण सर्वस्व हैं और हम प्रिया प्रियतम के प्राण सर्वस्व ।। ४१।।

