(राग कलिंगडा)
मन मेरे भज ले श्री कुंजबिहारी ।
सब सुख सागर रूप उजागर अंग संग प्रीतम प्यारी ।
श्री वृन्दावन घन नव निकुंज में करत केली भुजचारी ।
श्री बिहारी बिहारिनी दासी लड़ावति जीवन प्राण हमारी ।
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की बानी, सिद्धान्त के पद (184)
श्री बिहारिन देव जी कहते हैं, "हे मेरे मन! तू केवल श्री कुंजबिहारी की महिमा का स्मरण कर। जो समस्त सुखों के सागर हैं, जिनकी झलक सारे ब्रह्मांड में दीप्तिमान है, जो हमेशा श्रीराधा जी के साथ रहते है। जो चारों भुजाएँ(प्रिया प्रियतम की बाहें) वृन्दावन रूपी नव नित्य नवीन निकुंज में हमेशा केलि (लीला) करते रहते है। श्री बिहारी बिहारिन जी, जो जीवन प्राण है उनको लाड लड़ा ।"
मन मेरे भज ले श्री कुंजबिहारी ।
सब सुख सागर रूप उजागर अंग संग प्रीतम प्यारी ।
श्री वृन्दावन घन नव निकुंज में करत केली भुजचारी ।
श्री बिहारी बिहारिनी दासी लड़ावति जीवन प्राण हमारी ।
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की बानी, सिद्धान्त के पद (184)
श्री बिहारिन देव जी कहते हैं, "हे मेरे मन! तू केवल श्री कुंजबिहारी की महिमा का स्मरण कर। जो समस्त सुखों के सागर हैं, जिनकी झलक सारे ब्रह्मांड में दीप्तिमान है, जो हमेशा श्रीराधा जी के साथ रहते है। जो चारों भुजाएँ(प्रिया प्रियतम की बाहें) वृन्दावन रूपी नव नित्य नवीन निकुंज में हमेशा केलि (लीला) करते रहते है। श्री बिहारी बिहारिन जी, जो जीवन प्राण है उनको लाड लड़ा ।"

