काहू कौ बस नाहिं, तुम्हारी कृपा तें सब होय बिहारी-बिहारिनि -  श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (02)

काहू कौ बस नाहिं, तुम्हारी कृपा तें सब होय बिहारी-बिहारिनि - श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (02)

(राग विभास)
काहू कौ बस नाहिं, तुम्हारी कृपा तैं सब होय बिहारी-बिहारिनि। [1]
और मिथ्या प्रपंच, काहे कौं भाषियै, सु तौ है हारिनि॥ [2]
जाहि तुमसौं हित, तासौं तुम हित करौ, सब सुख कारनि। [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा-कुंजबिहारी, प्रानन के आधारनि॥ [4]
- ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (02)

हे बिहारी बिहारिणी! सुर-मुनि मोहिनी आपकी दुर्जय माया की प्रबलता ऐसी है कि किसी का भी बल नहीं है जो अपने साधन-प्रयत्न से आपकी माया से पार हो सके। जो कुछ भी होता है, वह आपकी कृपा से ही होता है। जीव को आत्मस्वरूप का ज्ञान और भक्ति का साधन, सब कुछ आपकी कृपा का ही परिणाम है। [1]

सांसारिक प्रपंचों में उलझना अथवा पर-निंदा जैसे तुच्छ कार्यों में समय गँवाना घोर अज्ञानता का लक्षण है। यह संकीर्ण वृत्ति हृदय की कोमल भक्ति को क्षीण कर देती है और साधक को उसके वास्तविक स्वरूप से गिरा देती है। [2]

हे नाथ! जो जीव जिस भाव से आपसे अनुराग करता है, आप भी उसी भाव से उसे आत्मसात करते हैं, क्योंकि आप ही समस्त रसों के मूल और सुखों के प्रदाता हैं। [3]

रसिक अनन्य नृपति श्रीस्वामी हरिदासजी महाराज उद्घोष करते हैं कि हमारे प्राणों के एकमात्र आधार, सर्वस्व और महामाधुर्यमयी नित्य-निकुंज-केलि में निरंतर रत रहने वाले श्रीश्यामा-कुंजबिहारी ही हमारे एकमात्र आराध्य हैं। [4]