येषां प्रेक्षा वितरति नवोदार गाढ़ानुरागान्,
मेघश्यामो मधुर-मधुरानन्द मूर्तिर्मुकुन्द:।
वृन्दाटव्यां सुमहिम चमत्कार कारीण्यहो किं,
तानि प्रेक्षेद्भुत रस निधानानि राधा पदानि ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (103)
जिन चरणार विन्दों की महिमा श्रीवृन्दा कानन में चमत्कृत हो रही है । जो रस के अद्भुत निधान हैं एवं नवीन और उदार अनुराग-पूर्ण मधुर-मधुरानन्द-मूर्ति घनश्याम मुकुन्द भी जिनके दर्शन की अभिलाषा का विस्तार करते रहते हैं, वे श्रीराधा-पद-कमल क्या मेरे नयन-गोचर होगे ?
मेघश्यामो मधुर-मधुरानन्द मूर्तिर्मुकुन्द:।
वृन्दाटव्यां सुमहिम चमत्कार कारीण्यहो किं,
तानि प्रेक्षेद्भुत रस निधानानि राधा पदानि ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (103)
जिन चरणार विन्दों की महिमा श्रीवृन्दा कानन में चमत्कृत हो रही है । जो रस के अद्भुत निधान हैं एवं नवीन और उदार अनुराग-पूर्ण मधुर-मधुरानन्द-मूर्ति घनश्याम मुकुन्द भी जिनके दर्शन की अभिलाषा का विस्तार करते रहते हैं, वे श्रीराधा-पद-कमल क्या मेरे नयन-गोचर होगे ?

