शरीरं श्रीवृन्दावनभुवि सदा स्थापय - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (3.61)

शरीरं श्रीवृन्दावनभुवि सदा स्थापय - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (3.61)

शरीरं श्रीवृन्दावनभुवि सदा स्थापय मनः, सदा पार्श्वे वृन्दावनरसिकयोर्न्यस्य भजने ।
वचस्तत्केलीनामनवरतगाने रमय त, त्कथापीयूषादौ श्रवणयुगलं प्रीति विकलम्॥

- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (3.61)

शरीर को सदा श्रीवृन्दावन भूमि में स्थिर रख, मनको श्रीवृन्दावन रसिकयुगल श्रीराधा-कृष्ण के निकट भजन में लगा, उनकी लीला गान में निरन्तर वाणी का प्रयोग कर एवं प्रेम से व्याकुल कानों को उनके कथामृत से तृप्त कर ॥