सोई जगत में जानि, जाकौं मैं मेरी लगी।
रसिकनि यह बानि, मैं मेरी करि लाड़िली॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत की साखी (400)
जिसको ‘मैं–मेरी’ की आसक्ति लगी हुई है, जो मैं-मेरापन से युक्त है, वही संसार है और वही संसार-माया के जाल में गँसा-जकड़ा हुआ है। किंतु भक्त-रसिक-संत महानुभावों की सहज बान-टेव यही होती है कि— “मैं एकमात्र कुंजविहारिणी लाड़िली की हूँ और एकमात्र लाड़िली ही मेरी हैं।” ऐसा ममत्व ही सबसे बड़ा सार-तत्त्व है।
रसिकनि यह बानि, मैं मेरी करि लाड़िली॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत की साखी (400)
जिसको ‘मैं–मेरी’ की आसक्ति लगी हुई है, जो मैं-मेरापन से युक्त है, वही संसार है और वही संसार-माया के जाल में गँसा-जकड़ा हुआ है। किंतु भक्त-रसिक-संत महानुभावों की सहज बान-टेव यही होती है कि— “मैं एकमात्र कुंजविहारिणी लाड़िली की हूँ और एकमात्र लाड़िली ही मेरी हैं।” ऐसा ममत्व ही सबसे बड़ा सार-तत्त्व है।

