ययोन्मीलत्केली विलसित कटाक्षैक कलया, कृतो वन्दी वृंदाविपिन कलभेंद्रो मदकल: ।
जडीभूत: क्रीडामृग-इव यदाज्ञा-लव कृते, कृती न: सा राधा शिथिलयतु साधारण-गतिम् ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (187)
जिन्होंने किञ्चित विकसित केली-विलास जन्य कटाक्षों की एक ही कला से श्रीवृंदावन के मदोन्मत्त गजराज किशोर (श्री लाल जी) को बंदी बना लिया और ऐसे बन्दी कि पूर्ण चतुर होते हुए भी वे उनकी लेश - मात्र आज्ञा के वशवत्तीर बने क्रीड़ा-मृग की तरह जड़ हो रहे हैं; वही श्रीराधा रानी मेरी साधारण गति (संसार गति) को शिथिल करें।
जडीभूत: क्रीडामृग-इव यदाज्ञा-लव कृते, कृती न: सा राधा शिथिलयतु साधारण-गतिम् ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (187)
जिन्होंने किञ्चित विकसित केली-विलास जन्य कटाक्षों की एक ही कला से श्रीवृंदावन के मदोन्मत्त गजराज किशोर (श्री लाल जी) को बंदी बना लिया और ऐसे बन्दी कि पूर्ण चतुर होते हुए भी वे उनकी लेश - मात्र आज्ञा के वशवत्तीर बने क्रीड़ा-मृग की तरह जड़ हो रहे हैं; वही श्रीराधा रानी मेरी साधारण गति (संसार गति) को शिथिल करें।

