जीव ईस मिली दोई - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 1 (5)

जीव ईस मिली दोई - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 1 (5)

जीव ईस मिली दोई, नाम रूप गुन परिहरै।
रसिक कहावै सोइ, ज्यों जल घोरै सर्करा॥

- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 1 (5)

जब जीव और ईश्वर—दोनों अपने नाम, रूप और गुण-भेदों को त्यागकर जल और शक्कर के मिश्रण (शरबत) की भाँति एकरूप हो जाते हैं, तब वह रसिक कहलाने लगते हैं।